वनवास भुगत रहे पांडवो को दुर्वासा ऋषि के कोप से बचाने के लिए योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण चावल का एक कण खाकर कहते है ,सारी सृष्टि तृप्त हो जाए ,तो भूखे दुर्वासा शिष्य मंडली अतिशय भोजन से तृप्त जमीन पर लोटने लगते है |
आत्मसंयम व सोच से आशय है , कल पूजा ,व्रत करके मै स्वर्ग चला जाउगा | मेरे सारे पाप मिट जायेगे ,मै धनवान, बलवान राजा हो जाउगा आदि आदि | ऐसा सोचना मात्र असफलता है | निरर्थकता है ,मूढ़ता है |
व्यक्ति व्रत है ,लेकिन आत्मसंयम नहीं है ,उसकी सोच ,आज तो मै व्रत हु ,कल चाट खाऊंगा ,गोलगप्पा खाऊगा,मोमोस खाऊगा ,जलेबी खाऊंगा आदि आदि | व्यक्ति अपने वासनाओ व चाहतो की कल्पना करता रहता है | अतः आत्म संयम रख कर शुद्ध विचार रखना ,हवन ,यज्ञ,सत्संग ,दान-पुण्य , सेवा व ईश्वर भक्ति में समय लगाना चाहिए |


















