Saturday, August 9, 2025

शिवमय बनारस ( immortal city, Base of Hindu religion)


वाराणसी को सांस्कृतिक और धार्मिक राजधानी कहा जाता है ,हिंदू धर्म को मानने वाले जीवन में एक बार यहां जरूर आते है। इसे हिंदुओं का मक्का मदीना भी कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी । साउथ के लोग काशी में एक बार जरूर आने को सौभाग्य मानते है। इतने देवी देवता के मंदिर शायद ही किसी शहर में हो । इसलिए इसे मंदिरों का शहर भी कहा जाता है । काशी को शिव की नगरी भी कहा जाता है । मान्यता है,माता पार्वती के अनुरोध पर शिव कैलाश छोड़ यहां रहने आए थे । जो उस वक्त अत्यंत सुंदर और शांत जगह थी।


धनवंतरी कूप:- बाबा मृत्युंजय महादेव दारानगर मैदागिन के प्रांगण में बना यह कूप का जल चमत्कारी माना जाता है। माना जाता है 41 दिनों तक इस जल के सेवन से सभी रोग दोष नष्ट हो जाते है । यही पर देवो के प्राकृतिक जड़ी बूटी औषधि चिकित्सक भगवान धनवंतरी तपस्या किए व स्वर्ग जाने से पूर्व अपनी सारी औषधिया जनहित हेतु इसी कुएं में डाल कर स्वर्ग चले गए।



नाग कूप: वाराणसी के जैतपुरा में यह कूप स्थित है,नाग पंचमी के दिन यहां विशेष दर्शन पूजन होता है। कहा जाता है,यही से नागलोक का रास्ता जाता है । यही शिवलिंग दर्शन कालसर्प दोष से मुक्ति मिलती है । नागपंचमी के दिन दर्शन योग्य जगह । इसकी गहराई अज्ञात बताई जाती है।



चंद्र कूप :माना जाता है, यहां चंद्रदेव ने तप किया था ,सिद्धेश्वरी मंदिर जो विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूर है। के प्रांगण में है ,माना जाता है,जिस पर मुसीबत होती है ,उसे इस कुएं में अपनी परछाई नहीं दिखती।



विशालाक्षी देवी:-51 शक्तिपीठ में एक यही माता सती के बड़े सुंदर नेत्र गिरे थे। विश्वनाथ मंदिर के बगल में है ।



रत्नेश्वर महादेव: इसे काशी करवट मंदिर भी कहा जाता है,ये गंगा सिंधिया घाट पर थोड़ा झुका शिव मंदिर है। गर्मी में ही यहां दर्शन होता है । अन्य अधिकतर यह जल में डूबा रहता है । शाप के प्रभाव से यह टेढ़ा हो गया है।



लोलार्क कुंड:भदैनी में स्थित यह कुंड को सूर्य के रथ के पहिया गिरने से बना बताया जाता है। भगवान सूर्य ने पुत्र प्राप्ति हेतु यही तपस्या किया था।  व लोलार्केश्वर महादेव शिव स्थापित हुए।  लोलार्क छठी के दिन संतान प्राप्ति हेतु यहां दर्शन पूजन स्नान का विधान पर्व है।





पंच कोशी मार्ग:यह साधारण मार्ग नहीं है,इस पर भगवान राम और पांडव भी चले है,25 कोस अर्थात 75 किलोमीटर के इस रास्ते पर 5 अति महत्वपूर्ण अलग अलग शिव मंदिर है।  गंगा मणिकार्णिका गंगा घाट से लेकर घुमकर यही समाप्त होता है। पुरुषोत्तम मास में जो हिंदू कैलेंडर अनुसार हर तीन साल में एक बार आता है,इस अवसर पर लोग इस रास्ते पर 5 दिन का तीर्थ करते है। युवा लोग हर महाशिवरात्रि की संध्या मणिकर्णिका से दौड़ कर 75 किलोमीटर अगले दिन परिक्रमा पूर्ण करते है ।


पंचकोशी मार्ग का दूसरा पड़ाव भीमचण्डी महादेव मंदिर है,जो शिव और शक्ति को समर्पित है । इसका निर्माण पांडवों ने किया था ।

पंचकोशी मार्ग का तीसरा पड़ाव रामेश्वर मंदिर है,इसे श्रीराम ने पंचकोशी परिक्रमा के दौरान रावण व ब्रम्ह हत्या के पाप से मुक्ति हेतु वरुणा नदी के बालू से स्थापित किया था ।

पंचकोशी परिक्रमा का चौथा पड़ाव शिवपुर है,अज्ञातवास के दौरान पांचों पांडवों ने पंचकोशी परिक्रमा के दौरान पांच शिवलिंग की स्थापना की थी जो आज भी है ।

पंचकोसी मार्ग का पांचवां प्रमुख पड़ाव कपिलधारा या वृषभेश्वर महादेव है। कपिल ऋषि जिन्होंने सगर के पुत्रों को जला कर राख कर दिया था । उनके तप से भगवान शिव ने नंदी सहित उन्हें यही दर्शन दिया था । एक कथा अनुसार भगवान शिव के काशी आने पर नंदी ने इसी स्थान पर रहने की आज्ञा मांगी । जो जिस वक्त सुंदर वन था । 



तिल भांडेश्वर महादेव: यह शिव मंदिर वाराणसी के पांडे हवेली बंगाली टोला इंटर कॉलेज के पीछे स्थित है, पहले यहां तिल का जंगल था । ऋषि विभाड़क की तपस्थली तप से स्वयंभू शिवलिंग है,जो हर साल तिल भर बढ़ जाता है ।

गौरी केदारेश्वर महादेव : यह मंदिर सोनारपुरा,गंगा केदार घाट पर है,ऋषि मान्धाता के तप से प्रसन्न भगवान शिव ने यहां दो भागों में खींचड़ी ग्रहण किया था । माना जाता है,इसकी महत्ता केदारनाथ की तरह है।



कर्दमेश्वर महादेव: इस शिवलिंग को कर्दम ऋषि ने स्थापित किया था, पंचकोशी मार्ग में पहला प्रमुख मंदिर ,कर्दम ऋषि के तप से भव्य कुंड भी यहां निर्मित है। यह वाराणसी का सबसे प्राचीन मंदिर माना जाता है,जो अब भी उसी रूप में स्थित है।



सारंगनाथ महादेव : सारंग ऋषि के भक्ति से प्रसन्न शिव यहां  स्थित है, सबसे उत्तरी कोना,सारनाथ भी सारंग ऋषि के नाम पर है, यह स्थान हिरणों का उद्यान था, यह स्थान बौद्ध धर्म के चार पवित्र स्थान में एक है। पृष्ठभूमि हिन्दू धर्म ही है। भगवान बुद्ध तप के बाद पहला उपदेश(धम्मेक स्तूप)यही दिए थे ।


उनकी कुछ अस्थियों के अवशेष मूलगंध कुटी बिहार बौद्ध मंदिर में रखी गई है। बौद्ध धर्म के लोग विश्व भर से यहा साल भर आते है। सावन में हिंदू व बुद्ध पूर्णिमा जिसे बुद्ध जयंती भी कहते है,को भव्य मेला लगता है। बौद्ध धर्म की कर्मस्थली जिसमें सम्राट अशोक ने यहां अन्य कार्य के साथ धम्मेक स्तूप बनवाया ।



बाबा विश्वनाथ:- यह 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है,नाम से आशय है, विश्व सृष्टि ब्रह्मांड के भगवान,एक बार ब्रह्मा विष्णु के बीच अहम हो गया की मैं बड़ा हु,तब भगवान एक ज्योति स्तंभ के रूप में प्रकट हुए व दोनों लोगों को आदि अंत पता लगाने को कहा दोनों असफल हुए और उनका अहंकार समाप्त हुआ।


मां अन्नपूर्णा: यह मंदिर विश्वनाथ मंदिर से कुछ दूर है ।माता पार्वती ने अन्न के संकट को दूर करने के लिए यह अवतार धारण किया था । भगवान शिव स्वयं भूख से राहत हेतु माता से भोजन मांगने पहुंचे । तब से अन्नदान को महादान कहा जाता है। यह निर्णय हुआ कि सृष्टि के लिए अन्न भी आवश्यक है।

संकट मोचन: इसी स्थान पर तुलसीदास जी को हनुमान जी ने दर्शन दिया था,उन्होंने यहां हनुमान जी की मूर्ति स्थापित किया। यही बैठकर तुलसी दास जी ने रामचरित मानस और हनुमान चालीसा की रचना की

 थी।

BHU यह एक विश्व विद्यालय है,1916 में महामना मदन मोहन मालवीय द्वारा दान मांग कर बनाया गया था,इसे एशिया का सबसे बड़ा यूनिवर्सिटी माना जाता है। प्राकृतिक शांत सुंदर माहौल में यहां विरला के सहयोग से एक भव्य शिव मंदिर भी है।

अस्सी घाट : वरुणा नदी और अस्सी नदी के नाम पर वाराणसी नाम पड़ा। यही अस्सी नदी मिलती है ,व वाराणसी का आखिरी घाट था। तुलसीदास यही ध्यान योग करते थे । यही उनकी मृत्यु हुई । यहां की शाम व गंगा आरती होती है। यही जगन्नाथ मंदिर है । और मां दुर्गा से जुड़ी कहानी की शुभ निशुंभ के वध बाद मां दुर्गा ने अपना खड्ग फेक दिया जिससे धरती फटी और असी नदी जलधारा बनी । जो इस क्षेत्र में दुर्गाकुंड मंदिर भी है।

दशाश्वमेध घाट :यही पर ब्रह्म ने शिव का काशी में स्वागत में इसका निर्माण किया था व दस अश्वमेध यज्ञ किया था । जिससे इसका नाम दशाश्वमेध नाम पड़ा । घाट के पास ही जंतर मंतर भी स्थित है। जो एक वेधशाला है । आज यहां गंगा आरती होती है,जो दर्शनीय है।



गंगा नदी : यहां गंगा दक्षिण से उत्तर की ओर बहती है,जो कौतुकपूर्ण है। जिससे अर्धचंद्र और धनुष की आकृति बनती है।



काल भैरो मंदिर :वाराणसी के बिशेश्वरगंज में स्थित है,शिव से उत्पन्न शिव के उग्र रूप है,ब्रह्म के झूठ से क्रोधित शिव ने इन्हें उत्पन किया और इन्होंने ब्रह्मा के पांचवे सिर को काट दिया, बाद में शिव ने इन्हें काशी का संरक्षक नियुक्त किया व वाराणसी में रहने का आदेश दिया। वाराणसी में 8 प्रमुख भैरव मंदिर है।


शूल टंकेश्वर महादेव  : बनारस का सबसे दक्षिणी कोना,माधव ऋषि की तपस्थली और शिवलिंग की स्थापना अनुसार पहले माधेश्वर महादेव नाम था, फिर इसी स्थान पर शिव ने त्रिशूल गाड़ कर गंगा से वाराणसी के रक्षा और उद्धार का वचन लिया था ।
तब वहां तपस्या कर ऋषियों ने इस शिवलिंग का नाम शूलटंकेश्वर महादेव रख दिया ।


मणिकार्णिका घाट: यहां पर भगवान विष्णु ने शिव तपस्या किया व अपने चक्र से शिव के लिए कुंड खोदा जब शिव आए स्नान किया तो उनके कान की मणि या बाली यहां खो गई इसी से इसका नाम मणिकर्णिका पड़ा कुछ कथा अनुसार माता पार्वती के कान की बाली यहां खो गई थी ।
माता सती के एक अंश का यहां अंतिम संस्कार किया गया था ।  मान्यता है यहां अग्नि नहीं बुझती ,ऐसी दशा में समय रुक जाएगा। काशी को मोक्ष की नगरी माना जाता है,इसलिए यहां अंतिम संस्कार का विशेष महत्व है।


अतः काशी और कैलाश ही महादेव भगवान शिव का प्रमुख स्थान है। गुरु पूर्णिमा और सावन में इन स्थानों पर मेला लगता है //

लेखक: बाबा.... शहर के___रविकांत यादव

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